मुंगेली/छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है। मुख्य विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस की जो आक्रामक भूमिका होनी चाहिए थी,वह धरातल पर कहीं नजर नहीं आ रही है। जिले में विकास कार्यों की कछुआ चाल,बदहाल सड़कें और कथित भ्रष्टाचार के बड़े मामलों पर स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व का यह “मौन” अब आम जनता के गले नहीं उतर रहा है। लोग अब खुलकर पूछने लगे हैं कि आखिर विपक्ष की इस चुप्पी का राज क्या है? क्या यह किसी डर का परिणाम है, किसी अदृश्य दबाव की परिणति है, या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ा ‘मैनेजमेंट’ खेल रहा है?
बदहाल सड़कें,धूल के गुबार और ठप पड़े विकास कार्य
मुंगेली जिले में आज सड़कों की बदहाली,गड्ढे,हवा में उड़ते धूल के गुबार और वर्षों से अधूरे पड़े निर्माण कार्य आम आदमी की नियति बन चुके हैं। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में हो रही भारी देरी से आम जनता त्रस्त है। जनहित से जुड़ी मूलभूत समस्याओं का समय पर निराकरण नहीं हो पा रहा है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में रोजाना घंटों बिजली कटौती की समस्या से लोग बेहाल हैं, कई योजनाएं बंद होने की कगार पर हैं।
हैरानी की बात यह है कि इन जनविरोधी मुद्दों पर स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व ने कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करना तो दूर,प्रशासन के खिलाफ एक कड़ा बयान तक जारी करना मुनासिब नहीं समझा।
DMF में भयंकर भ्रष्टाचार और सुशासन तिहार पर आक्रोश
मुंगेलीवासियों का आरोप है कि जिले में जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) की राशि में करोड़ों रुपए का बंदरबांट और भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है। टेंडर प्रक्रियाओं में गड़बड़ी से लेकर धरातल पर हो रहे घटिया निर्माण तक की चर्चाएं सरेआम हैं। अमूमन ऐसे संवेदनशील और वित्तीय अनियमितता के मुद्दों पर आक्रामक रहने वाली कांग्रेस आखिर क्यों इन मामलों को नजरअंदाज कर रही है,यह बात किसी के समझ से परे है।
इसके साथ ही, पिछले वर्ष आयोजित हुए ‘सुशासन तिहार’ में जनता द्वारा दिए गए हजारों आवेदनों का आज तक कोई निराकरण नहीं हुआ है। जनसमस्याएं जस की तस बनी हुई हैं,जिससे नागरिकों में भारी आक्रोश है, लेकिन विपक्ष इस आक्रोश को आवाज देने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।
तीन बड़े सवाल: डर, दबाव या मैनेजमेंट?
राजनीतिक विश्लेषकों और मुंगेली के आम नागरिकों के बीच विपक्ष की इस निष्क्रियता को लेकर तीन मुख्य संभावनाओं पर तीखी चर्चा हो रही है:
- डर: क्या सत्ता पक्ष की किसी संभावित वैधानिक या राजनीतिक कार्रवाई का कोई अनजाना डर स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को मुखर होने से रोक रहा है?
- दबाव: क्या संगठन के भीतर से ही या किसी प्रभावशाली गुट की ओर से स्थानीय नेतृत्व पर चुप रहने का कोई अंदरूनी दबाव बनाया गया है?
- मैनेजमेंट: या फिर यह किसी “अघोषित समझौते” का हिस्सा है, जहाँ आपसी ‘मैनेजमेंट’ के जरिए विपक्ष की धार को कुंद कर दिया गया है और सत्ता पक्ष को सीधे तौर पर ‘वॉकओवर’ दे दिया गया है?
इस असमंजस का सबसे बुरा असर जमीन पर काम करने वाले स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर पड़ रहा है। कार्यकर्ताओं का दर्द है कि अगर वे जनता के हक और उनके मुद्दों के लिए सड़क पर नहीं उतरेंगे,तो आगामी चुनावों में किस आधार पर जनता के बीच जाकर वोट मांगेंगे। लोकतंत्र में विपक्ष की ऐसी चुप्पी आत्मघाती होती है,जो जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ जैसी है।

पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज ने जताया आक्रोश, कहा– “मुंगेली जिलाध्यक्ष से करूँगा बात”
मुंगेली कांग्रेस की इस सुस्ती और सुशासन तिहार की जमीनी हकीकत पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष दीपक बैज ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने पूरे प्रदेश की स्थिति पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा:
“पूरे प्रदेश में सुशासन तिहार को लेकर जनता में भारी गुस्सा और आक्रोश है। यह सुशासन तिहार सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति बनकर रह गया है। आज स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री आवास के लिए गरीब जनता को सरकारी अधिकारियों के पैर पकड़ने पड़ रहे हैं। डोंगरगढ़ में तो उग्र जनता ने अधिकारियों को कमरे में बंद कर ताला तक लगा दिया था। इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार की इस कवायद से लोग कितने परेशान हैं। पिछले समय दिए गए आवेदनों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।”
मुंगेली के स्थानीय नेतृत्व के मौन पर श्री बैज ने स्पष्ट किया:
“कांग्रेस पार्टी छोटा मुद्दा हो या बड़ा मुद्दा,जनता के हितों की लड़ाई लगातार उठा रही है। जहाँ तक मुंगेली का सवाल है,मैं खुद मुंगेली जिलाध्यक्ष से इस विषय में सीधे बात करूंगा। अगर स्थानीय स्तर पर कोई कमी या ढिलाई है,तो उसे दूर किया जाएगा। निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी जनता के मुद्दों को लेकर सड़क से सदन तक हर लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।”
मुंगेली कांग्रेस को अब यह समझना होगा कि राजनीति में ‘मौन’ हमेशा कोई रणनीति नहीं होता, कभी-कभी जनता इसे समर्पण मान लेती है। अब देखना यह है कि पीसीसी अध्यक्ष की सख्ती के बाद क्या स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व इस गहरी नींद से जागता है, या फिर यह चुप्पी जिले की राजनीति में किसी नई उथल-पुथल की आहट है।



