मुंगेली/क्या आधुनिकता का रास्ता सिर्फ और सिर्फ पर्यावरण की लाशों से होकर ही गुजर सकता है? क्या जब-जब शासन-प्रशासन की फाइलों में ‘विकास’ शब्द मुस्कुराएगा,तब-तब धरती पर सदियों से छांव दे रहे हरे-भरे वृक्षों की चीखें गूंजेंगी?,क्या विकास का पैमाना वृक्षों की बलि लिए बिना पूरा नहीं होता? यह सवाल आज हर उस नागरिक के जेहन में एक सुलगता हुआ अंगारा बन चुका है,जो कंक्रीट और डामर के इस बढ़ते अंधाधुंध जंगल में अपनी अगली पीढ़ी के सुरक्षित भविष्य को लेकर चिंतित है।
मुंगेली से नांदघाट तक बनने वाली करीब 37 किलोमीटर लंबी नवीन सड़क के नाम पर सैकड़ों विशालकाय और छायादार पेड़ों को जमींदोज करने की जो पटकथा लिखी जा चुकी है,वह महज एक निर्माण कार्य नहीं,बल्कि इस अंचल की जीवनदायिनी ऑक्सीजन फैक्ट्री पर प्रशासनिक बुलडोजर चलाने की क्रूर तैयारी है।
विकास के नाम पर हर बार बलि ली गई वृक्षों की
यह कोई पहली बार नहीं है जब मुंगेली में विकास के नाम पर प्रकृति का गला घोंटा जा रहा हो। यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें,तो लोक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का इतिहास मुंगेली के पर्यावरण को लहूलुहान करने से भरा पड़ा है
मुंगेली-बिलासपुर मुख्य मार्ग:इस मार्ग के चौड़ीकरण के दौरान सड़क के दोनों ओर खड़े दशकों पुराने बरगद,पीपल और अर्जुन के वृक्षों को बेरहमी से काटकर डामर और कंक्रीट के मलबे में तब्दील कर दिया गया।
मुंगेली-कवर्धा मुख्य मार्ग:यहाँ भी चौड़े टेंडर और बड़े बजट की आड़ में उन पेड़ों की बलि ले ली गई,जो यात्रियों को चिलचिलाती धूप में शीतल छांव देते थे।
नगर का गौरवपथ निर्माण:शहर के भीतर बने गौरवपथ ने तो मुंगेली की पहचान ही बदल दी। बेतरतीब तरीके से हरियाली को उजाड़कर कंक्रीट का ऐसा ढांचा खड़ा किया गया कि आज अपनी बदहाली हाल खुद बयां कर रहा है
₹112 करोड़ का बजट,18 महीने की समय-सीमा और विनाश का खाका
सड़क निर्माण का सच यह है कि केंद्र सरकार की केंद्रीय सड़क निधि के तहत इस 37 किमी के मार्ग के लिए 112 करोड़ 88 लाख 50 हजार रुपए की भारी-भरकम राशि स्वीकृत की गई है। लोक निर्माण विभाग ने औपचारिकताएं पूरी करते हुए रायगढ़ के ठेकेदार सुभाष कुमार अग्रवाल को 8 अप्रैल 2026 को कार्य आदेश भी जारी कर दिया है। ठेकेदार को 18 महीने में यह सड़क डामर और कंक्रीट से पाटकर तैयार करनी है।
लेकिन इस चमचमाती सड़क के पीछे जो भयावह अंधेरा छिपा है,उसका हिसाब कौन देगा? ठेकेदार का मुनाफा तय है,नेताओं का श्रेय तय है…लेकिन आम जनता के हिस्से में आने वाली भयंकर गर्मी,दूषित हवा और सूखा भी अब तय हो चुका है।
जनता की हुंकार:”हम बुजुर्गों को कटते नहीं देख सकते!”
मुंगेली के जागरूक नागरिकों,पर्यावरणविदों और आम जनता का स्पष्ट कहना है कि वे सरकार के द्वारा कराए जा रहे विकास के विरोधी नहीं हैं। नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं जैसे सड़क,बिजली और पानी मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है,जिसके लिए जनता अपने मत का प्रयोग कर इनको चुनती है।
“ये पेड़ हमारे लिए महज लकड़ी का ढांचा या वन विभाग के आंकड़े नहीं हैं। ये हमारे उन बुजुर्गों की तरह हैं,जो पीढ़ियों से बिना किसी स्वार्थ के हमें शुद्ध हवा और छांव रूपी जीवनदान दे रहे हैं। जब हमारी खुद की सांसें कंक्रीट के धुएं में घुट रही हों, तब ऐसी चौड़ी सड़कों पर तेज रफ्तार गाड़ियां दौड़ाकर हम कहाँ पहुंचना चाहते हैं?”
आम नागरिक का दर्द
‘एक पेड़ माँ के नाम’ का ढोंग और आयोजनों की हकीकत
यह स्थिति तब और भी ज्यादा कचोटती है और व्यवस्था पर हंसने को मजबूर करती है,जब खुद केंद्र और राज्य सरकारें “एक पेड़ माँ के नाम”जैसे मेगा अभियानों का ढिंढोरा पीटती हैं। इन आयोजनों के नाम पर सरकारी खजाने से लाखों-करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए जाते हैं।
आयोजनों की हकीकत भी जगजाहिर है
वीआईपी फोटोबाजी:सूबे के मुखिया सहित कैबिनेट मंत्री,स्थानीय विधायक और बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी सज-धजकर आते हैं,चमचमाती खुरपी पकड़ते हैं और कैमरों के सामने मुस्कुराते हुए पौधे रोपते हैं।और पर्यावरण को बचाने को लेकर बड़ी बड़ी बातें की जाती है
दिखावे का संदेश:अखबारों और टीवी पर ‘पर्यावरण संरक्षण’ के लंबे-चौड़े उपदेश दिए जाते हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट का सच:इन आयोजनों के ठीक एक महीने बाद उन पौधों में से कितने सलामत रहते हैं,कितनों को मवेशी खा जाते हैं और कितने पानी के बिना सूख जाते हैं,इसकी सुध लेने कोई नहीं आता।
प्रशासन से सीधा सवाल:जो पौधे कल वृक्ष बनेंगे या नहीं,जिसकी कोई गारंटी नहीं है,उनके नाम पर तो सरकारी तंत्र करोड़ों का तमाशा करता है;लेकिन जो वृक्ष सदियों से,बिना किसी सरकारी बजट के,आम जनता की सेवा कर रहे हैं,उन्हें सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश से काटने का अधिकार आपको किसने दिया? क्या यह दोहरा चरित्र नहीं है?
जागिए सरकार! दुनिया बदल गई,आपकी तकनीक क्यों नहीं बदली?
आज जब हम 2026 में जी रहे हैं, दुनिया भर में ‘इंजीनियरिंग विद नेचर'(प्रकृति के साथ विकास) की अवधारणा पर काम हो रहा है। विकास और पर्यावरण को साथ लेकर चलने के कई विकल्प सरकार के पास मौजूद हैं, बशर्ते इरादा नेक हो:
हाइवे रीडिजाइनिंग:यदि सड़क के बीच में कोई विशालकाय या ऐतिहासिक पेड़ आ रहा है,तो विदेशों और भारत के भी कई प्रगतिशील राज्यों में सड़क को वहां से थोड़ा मोड़ दिया जाता है या उस पेड़ को एक खूबसूरत ‘ग्रीन डिवाइडर’ का रूप दे दिया जाता है।
ट्री ट्रांसप्लांटेशन:आज ऐसी अत्याधुनिक मशीनें मौजूद हैं जो 50 से 100 साल पुराने पेड़ों को भी बिना नुकसान पहुंचाए,जड़ समेत उखाड़कर दूसरी सुरक्षित जगह पर री-प्लांट (पुनर्जीवित) कर सकती हैं। ₹112 करोड़ के इस भारी-भरकम बजट में से क्या कुछ प्रतिशत हिस्सा इन पेड़ों को बचाने या ट्रांसप्लांट करने के लिए सुरक्षित नहीं रखा जा सकता था?
अलाइनमेंट में बदलाव:लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर सिर्फ दफ्तरों में बैठकर लकीर खींचने के बजाय ग्राउंड सर्वे क्यों नहीं करते,ताकि कम से कम पेड़ों को काटना पड़े?
अंतिम चेतावनी:कंक्रीट की सड़कें छांव नहीं देंगी!
सड़कें बन जाएंगी,गाड़ियां रफ्तार भरेंगी और मुंगेली-नांदघाट का सफर कुछ मिनट कम जरूर हो जाएगा। लेकिन याद रखिए,जब आने वाले सालों में मुंगेली का भूजल स्तर पाताल में चला जाएगा,जब यहां की हवा में सिर्फ डामर और धुएं की गंध होगी और जब तापमान 48 डिग्री को पार कर जाएगा,तब ये ₹112 करोड़ की कंक्रीट की सड़कें हमारी आने वाली पीढ़ी को एक बूंद पानी या एक पल की ठंडी छांव नहीं दे पाएंगी।
यह खबर हर नागरिक के लिए एक चेतावनी है कि वे अपनी चुप रहने की आदत को बदलें और शासन-प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों के लिए एक आईना है कि वे अपनी विकास की अंधी नीतियों पर दोबारा विचार करें। मुंगेली-नांदघाट मार्ग के टेंडर और नक्शे की समीक्षा फिर से होनी चाहिए:क्योंकि विकास जीवन को सुगम बनाने के लिए होता है,जीवन छीनने के लिए नहीं!



