
चातरखार के पास पाइप से भरी ट्रक की टक्कर से बाइक सवार महिला की मौके पर मौत,निर्माणाधीन सड़क पर सुरक्षा इंतजामों को लेकर उठे गंभीर सवाल;भूमिपूजन और लोकार्पण तक सिमटा विकास का दावा,जनता पूछ रही:आखिर कब बदलेगा सिस्टम?
मुंगेली/विकास की राह पर दौड़ने का सपना देखने वाले समाज के सामने एक बार फिर ऐसा दर्दनाक मंजर आया,जिसने सड़क निर्माण कार्यों की गति, गुणवत्ता और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुंगेली-कवर्धा मुख्य मार्ग पर चल रहे सड़क निर्माण कार्य के दौरान चातरखार के पास पाइप से भरी एक ट्रक की टक्कर से बाइक सवार महिला की मौके पर ही मौत हो गई। इस दर्दनाक हादसे के बाद घटनास्थल पर ग्रामीणों और राहगीरों की भीड़ जुट गई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और शव को अपने कब्जे में लेकर पंचनामा की कार्रवाई के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
एक महिला की असमय मौत ने उसके परिवार को कभी न भरने वाला जख्म दे दिया,लेकिन इस घटना ने आम लोगों के मन में एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है—क्या विकास की कीमत आम नागरिकों की जान देकर चुकाई जाएगी? सड़क निर्माण का उद्देश्य लोगों को बेहतर आवागमन की सुविधा देना है,लेकिन यदि निर्माणाधीन मार्ग ही लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा बनने लगे,तो ऐसी व्यवस्था की जवाबदेही तय होना भी उतना ही जरूरी है।
विकास चाहिए,लेकिन क्या लोगों की जान की कीमत पर?
आज सड़कें बन रही हैं, योजनाओं की घोषणाएं हो रही हैं, जगह-जगह भूमिपूजन और लोकार्पण के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। जनप्रतिनिधि विकास कार्यों को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इन तमाम दावों के बीच जब किसी निर्माणाधीन सड़क पर हादसा होता है और किसी परिवार का सदस्य हमेशा के लिए बिछड़ जाता है,तब विकास के इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
चातरखार के पास हुई इस घटना के बाद ग्रामीणों और राहगीरों में आक्रोश है। लोगों का सवाल है कि आखिर निर्माण कार्य के दौरान यातायात को सुरक्षित रखने के लिए क्या पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं? क्या दुर्घटना संभावित स्थानों पर चेतावनी संकेतक लगाए गए हैं? क्या भारी वाहनों की आवाजाही और दोपहिया वाहन चालकों की सुरक्षा को लेकर जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं? यदि सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी थी,तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग और जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए।
भूमिपूजन और लोकार्पण से आगे भी है जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी
सड़क निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में मंत्री,सांसद,विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों की भूमिका केवल योजनाओं की घोषणा करने,भूमिपूजन करने अथवा लोकार्पण समारोह में शामिल होने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जनता उन्हें अपना प्रतिनिधि इसलिए चुनती है,ताकि विकास कार्यों का लाभ आम लोगों तक पहुंचे और उनकी समस्याओं का समाधान हो।
ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि निर्माण कार्यों की प्रगति की नियमित समीक्षा कितनी गंभीरता से की जाती है? क्या कार्यस्थल पर सुरक्षा इंतजामों का निरीक्षण होता है? क्या निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग से काम की गुणवत्ता,निर्धारित समयसीमा तथा यातायात व्यवस्था को लेकर जवाब मांगा जाता है?
यह आवश्यक नहीं कि हर दुर्घटना के लिए किसी जनप्रतिनिधि को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाए,लेकिन जनहित से जुड़े कार्यों की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना उनकी सार्वजनिक जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
कछुआ चाल से चल रहे निर्माण कार्य और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
निर्माणाधीन सड़कों पर अक्सर लोगों को धूल,गड्ढों,अधूरे हिस्सों,यातायात बाधाओं और आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ता है। यदि किसी परियोजना का काम निर्धारित समयसीमा से पीछे चल रहा हो,तो लोगों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। हालांकि,मुंगेली-कवर्धा मुख्य मार्ग के इस हिस्से में काम की वास्तविक प्रगति,स्वीकृत समयसीमा और सुरक्षा इंतजामों की स्थिति की आधिकारिक जांच आवश्यक है।
सवाल यह है कि संबंधित विभाग निर्माण कार्य की नियमित निगरानी कर रहा है या नहीं? ठेकेदार को जारी वर्क ऑर्डर में काम पूरा करने की क्या समयसीमा निर्धारित है? क्या कार्यस्थल पर निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है? यदि किसी प्रकार की लापरवाही सामने आती है, तो क्या जिम्मेदारों के विरुद्ध कार्रवाई होगी?
इन बिंदुओं की निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि हादसे के पीछे सड़क निर्माण स्थल की कोई सुरक्षा संबंधी कमी थी या कोई अन्य कारण जिम्मेदार था।
जनता की जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता कोई निर्माण कार्य
विकास का वास्तविक अर्थ केवल सड़क,भवन और अन्य अधोसंरचनाओं का निर्माण करना नहीं है। विकास तभी सार्थक है,जब उसके साथ आम नागरिकों की सुरक्षा,सुविधा और जीवन की रक्षा भी सुनिश्चित हो। यदि किसी निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी होती है,तो उसकी कीमत किसी निर्दोष परिवार को अपनी खुशियां गंवाकर चुकानी पड़ सकती है।
चातरखार की यह घटना इसी गंभीर चिंता की ओर इशारा करती है। एक ओर बेहतर सड़क की उम्मीद है, तो दूसरी ओर उसी सड़क पर सफर करने वाले लोगों की सुरक्षा का प्रश्न है। ऐसे में निर्माण एजेंसी और संबंधित विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि काम के दौरान यातायात का संचालन सुरक्षित तरीके से हो,आवश्यक चेतावनी संकेतक और बैरिकेडिंग उपलब्ध हों तथा दुर्घटना की आशंका वाले स्थानों पर विशेष निगरानी रखी जाए।
अब सवालों से नहीं,जवाबदेही से चलेगा काम
इस हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदार कौन है—शासन,प्रशासन,संबंधित निर्माण विभाग या ठेकेदार? इसका फैसला आरोपों अथवा राजनीतिक बयानबाजी से नहीं,बल्कि तथ्यों पर आधारित निष्पक्ष जांच से होना चाहिए।
पुलिस और संबंधित विभाग को दुर्घटना के कारणों की जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या निर्माण स्थल पर सुरक्षा संबंधी कोई कमी थी,ट्रक चालक की भूमिका क्या रही और क्या निर्धारित नियमों का पालन किया जा रहा था। यदि किसी की लापरवाही सामने आती है, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही,निर्माणाधीन मार्ग पर तत्काल सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
क्योंकि किसी सड़क का निर्माण पूरा होने के बाद उसका लोकार्पण होना उपलब्धि हो सकती है,लेकिन निर्माण के दौरान लोगों की जान सुरक्षित रखना उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
आज एक महिला की मौत ने पूरे सिस्टम के सामने सवाल खड़ा कर दिया है। क्या इस हादसे के बाद जिम्मेदार विभाग जागेगा? क्या निर्माणाधीन सड़क पर सुरक्षा व्यवस्था दुरुस्त होगी? क्या ठेकेदार और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी? या फिर यह घटना भी कुछ दिनों की चर्चा के बाद फाइलों में सिमटकर रह जाएगी?
जनता को सिर्फ विकास के दावे नहीं,सुरक्षित सड़कें चाहिए। उसे सिर्फ आश्वासन नहीं,जवाबदेही चाहिए। क्योंकि विकास की असली पहचान फीते काटने से नहीं, बल्कि उन रास्तों पर चलने वाले लोगों की जिंदगी सुरक्षित रखने से होती है।



