साइबर ठगी की रकम बैंक खातों के माध्यम से इधर-उधर करने के मामले में न्यायालय का अहम फैसला,सत्र न्यायाधीश श्रीमती गिरिजा देवी मेरावी ने सुनाई सजा
मुंगेली/साइबर अपराध के जरिए ठगी गई करोड़ों रुपये की रकम को बैंक खातों के माध्यम से प्राप्त करने और उसके लेन-देन में खातों का इस्तेमाल करने के मामले में मुंगेली न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। थाना सिटी कोतवाली मुंगेली के अपराध क्रमांक 77/2025 के अंतर्गत दर्ज प्रकरण में आरोपी संजीव जांगड़े को दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के सश्रम कारावास और 10 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया है। माननीय सत्र न्यायाधीश मुंगेली श्रीमती गिरिजा देवी मेरावी ने 22 अक्टूबर को यह निर्णय सुनाया।
प्रकरण के अनुसार,आरोपी संजीव जांगड़े,उम्र 38 वर्ष,पिता धनऊराम,निवासी ग्राम बोदा,थाना फास्टरपुर,जिला मुंगेली पर अपने नाम से तथा अपने परिचितों के नाम से बैंक खाते खुलवाकर उनका उपयोग म्यूल अकाउंट के रूप में कराने का आरोप था। इन बैंक खातों के माध्यम से साइबर ठगी से प्राप्त लगभग 4 करोड़ 53 लाख 89 हजार 567 रुपये की राशि का लेन-देन किए जाने की बात सामने आई थी।
धारा 317(2) बीएनएस के तहत सुनाई गई सजा
थाना सिटी कोतवाली में दर्ज अपराध के इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 111,317(2),317(4),317(5) एवं 3(5) के तहत अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था। प्रकरण की सुनवाई के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी संजीव जांगड़े को धारा 317(2) बीएनएस के तहत दोषी ठहराया और तीन वर्ष के सश्रम कारावास के साथ 10 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई।
वहीं,इसी प्रकरण के अन्य अभियुक्तों को न्यायालय ने संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। साथ ही प्रकरण में कई आरोपी वर्तमान में फरार बताए गए हैं।
क्या होता है म्यूल अकाउंट?
म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते को कहा जाता है,जिसका इस्तेमाल साइबर अपराधी ऑनलाइन ठगी से प्राप्त रकम को एक खाते से दूसरे खाते में भेजने अथवा उसे निकालने के लिए करते हैं। कई मामलों में अपराधी लोगों को पैसों का लालच देकर या अन्य तरीकों से उनके बैंक खाते का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे खातों के जरिए ठगी की रकम के वास्तविक स्रोत और उसे संचालित करने वाले लोगों की पहचान छिपाने का प्रयास किया जाता है।
साइबर अपराध से जुड़े मामलों में बैंक खातों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है,क्योंकि ठगी की रकम को अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर उसका पता लगाना कठिन बनाने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में खाताधारकों की भूमिका,उनकी जानकारी और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच एवं न्यायिक कार्रवाई की जाती है।
14 गवाहों के माध्यम से अभियोजन पक्ष ने रखा मामला
इस प्रकरण में लोक अभियोजक रजनीकांत सिंह ठाकुर ने अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी की। उन्होंने कुल 14 गवाहों के माध्यम से न्यायालय के समक्ष प्रकरण को सिद्ध किया। न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत तथ्यों पर विचार करने के बाद आरोपी संजीव खांडे को संबंधित धारा के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
न्यायालय के इस फैसले से साइबर ठगी की रकम के लेन-देन में बैंक खातों के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक कार्रवाई सामने आई है। वहीं,प्रकरण के फरार आरोपियों के संबंध में आगे की कार्रवाई की प्रतीक्षा है।



