मातारानी के आगमन में फिल्मी गानों पर झूमे युवा,सनातन परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल
पितृपक्ष के बीच भव्य आगमन,ढोल-ताशे,आतिशबाजी और लाइटिंग पर लाखों खर्च की चर्चा;धार्मिक आयोजन में फिल्मी गानों के इस्तेमाल को लेकर लोगों में बहस
मुंगेली/नगर में पिछले कुछ वर्षों से गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव के दौरान प्रतिमा स्थापना से पहले भव्य आगमन की एक नई परंपरा देखने को मिल रही है। समितियों द्वारा देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को नगर भ्रमण कराया जाता है। इस दौरान ढोल-ताशे,डीजे,आकर्षक लाइटिंग और आतिशबाजी के बीच बड़ी संख्या में लोग आगमन कार्यक्रम देखने के लिए सड़कों पर उमड़ते हैं। बुधवार की रात भी कुछ ऐसा ही नजारा नगर में देखने को मिला,जब एक समिति द्वारा मातारानी की प्रतिमा का भव्य आगमन कराया गया।
कई वर्षों से नगर के हृदय स्थल में मातारानी की प्रतिमा स्थापित करने वाली संबंधित समिति के इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और नगरवासी मौजूद रहे। आगमन के दौरान आतिशबाजी,रोशनी और ध्वनि के बीच युवाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। हालांकि इसी आयोजन के दौरान बजाए गए गीतों को लेकर अब धार्मिक आयोजनों की मर्यादा,सनातन परंपरा और आयोजन समितियों की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मातारानी का आगमन या फिल्मी गानों पर जश्न?
आयोजन के दौरान धुमाल पार्टी में समिति के सदस्यों की फरमाइश पर कई फिल्मी गीत बजाए जाने की चर्चा रही। इनमें “मेरी कॉलेज की एक लड़की है”,“सुन मेरी शहजादी,मैं तेरा शहजादा””कर दूंगा मैं तेरी टाय टाय फिस्स” और “दुनिया में लोगों को धोखा कहीं हो जाता है” जैसे अनेकों गीतों के साथ कुछ प्रादेशिक भाषा के गीत भी शामिल रहे। इन गीतों पर युवक-युवतियों को झूमते और नाचते देखा गया।
यही दृश्य अब नगर में चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल यह है कि जब आयोजन का केंद्रबिंदु मातारानी की प्रतिमा का आगमन और धार्मिक भावना है,तो क्या ऐसे आयोजनों में मनोरंजन के लिए किसी भी तरह के फिल्मी गीतों का इस्तेमाल उचित माना जाना चाहिए? क्या धार्मिक आयोजनों की अपनी कोई मर्यादा और सांस्कृतिक सीमा नहीं होनी चाहिए?
दूसरों की टिप्पणी पर विरोध,अपने आयोजन पर खामोशी क्यों?
इस पूरे मामले ने हिंदुत्व और सनातन संस्कृति को लेकर एक दूसरा सवाल भी खड़ा कर दिया है। जब किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की ओर से हिंदू धर्म,देवी-देवताओं या सनातन परंपराओं को लेकर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी सामने आती है तो हिंदू संगठनों द्वारा विरोध और आपत्ति दर्ज कराई जाती है।
लेकिन जब कथित तौर पर धार्मिक आयोजन से जुड़े लोग ही उसी आयोजन में ऐसे तौर-तरीके अपनाते हैं जिन्हें कुछ लोग सनातन संस्कृति की मर्यादा के अनुरूप नहीं मान रहे हैं,तब वही संगठन और धर्म की बात करने वाले लोग इस पर सार्वजनिक रूप से सवाल क्यों नहीं उठाते?
क्या धार्मिक विषयों पर विरोध भी व्यक्ति,संगठन या प्रभाव देखकर तय होगा? क्या धार्मिक मर्यादा का पैमाना सभी के लिए समान नहीं होना चाहिए? नगर में अब यही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है।
नई समितियों से अलग,वर्षों पुरानी समिति पर ज्यादा सवाल
आम नागरिकों के बीच यह चर्चा भी रही कि यदि कोई नई समिति अनजाने में इस प्रकार का आयोजन कर देती तो उसे अनुभव की कमी मानकर समझा जा सकता था। लेकिन जिस समिति द्वारा पिछले कई वर्षों से मातारानी की स्थापना की जा रही है और जिसकी नगर में एक अलग पहचान बनी हुई है,उससे धार्मिक आयोजन की मर्यादा को लेकर अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से की जाती है।
धार्मिक आयोजन जितना बड़ा होता है,आयोजकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है। खासकर तब,जब हजारों लोग उस आयोजन को देखते हैं और युवा वर्ग भी उससे प्रभावित होता है।
पितृपक्ष के बीच आयोजन को लेकर भी उठे सवाल
बुधवार रात हुए इस आयोजन का एक अन्य पहलू भी चर्चा में है। वर्तमान में पितृपक्ष चल रहा है और सनातन परंपराओं में इस अवधि को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं और मर्यादाएं प्रचलित हैं। ऐसे में प्रतिमा के भव्य आगमन जैसे आयोजन को लेकर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए हैं।
हालांकि इस संबंध में धार्मिक परंपराओं की अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं,लेकिन इतना जरूर है कि धार्मिक आयोजनों को लेकर समितियों को लोगों की आस्था,स्थानीय परंपरा,धार्मिक मान्यताओं और प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों का ध्यान रखना चाहिए।
प्रशासन की बैठकों का क्या मतलब,यदि जमीन पर पालन नहीं?
हर वर्ष गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव से पहले जिला एवं पुलिस प्रशासन द्वारा समितियों,जनप्रतिनिधियों, व्यापारियों,पत्रकारों और गणमान्य नागरिकों की बैठक आयोजित कर आयोजन से संबंधित दिशा-निर्देश बताए जाते हैं। ऐसे में सवाल यह भी है कि इन बैठकों में धार्मिक जुलूस,डीजे,ध्वनि,आतिशबाजी,यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर जो नियम एवं शर्तें बताई जाती हैं,उनका पालन वास्तविक आयोजनों के दौरान किस तरह कराया जाता है?
यदि नियम पहले से निर्धारित हैं तो क्या सभी समितियों को उनकी स्पष्ट जानकारी दी जाती है? और यदि जानकारी दी जाती है तो फिर उनके पालन की जिम्मेदारी किसकी है?
नगरवासियों का सवाल यह भी है कि प्रशासन की मौजूदगी और जानकारी के बावजूद यदि सार्वजनिक मार्गों पर देर रात तक बड़े आयोजन होते हैं तो नियमों की निगरानी और पालन सुनिश्चित करने की व्यवस्था क्या है?
गौरतलब हो कि ये कोई पहला आयोजन नहीं है जिसमे ये सब किया गया इसके पहले भी गणेश उत्सव के दौरान भी गणेश आगमन और उनके विसर्जन के समय भी इसी तरह का माहौल देखा गया था
राजनीतिक प्रभाव के कारण कार्रवाई से बचता है प्रशासन?
इन आयोजनों को लेकर एक और चर्चा आम नागरिकों के बीच सुनने को मिल रही है कि धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों पर कार्रवाई करने से प्रशासन अक्सर बचता है,क्योंकि ऐसे मामलों के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव की आशंका रहती है। हालांकि यह एक जनचर्चा है,जिसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
यही कारण है कि प्रशासन के सामने भी चुनौती रहती है कि धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए कानून-व्यवस्था और निर्धारित नियमों का पालन किस तरह समान रूप से कराया जाए।
आस्था के साथ मर्यादा भी जरूरी
मातारानी का आगमन श्रद्धा और आस्था का विषय है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का एकत्र होना और धार्मिक आयोजन के प्रति उत्साह स्वाभाविक है। लेकिन सवाल यह है कि क्या धार्मिक आयोजनों की भव्यता केवल तेज आवाज,फिल्मी गानों,आतिशबाजी और प्रदर्शन से तय होगी या फिर उसमें धार्मिक मर्यादा,संस्कृति और अनुशासन को भी उतना ही महत्व दिया जाएगा?
मुंगेली में बुधवार रात हुए इस आयोजन ने इसी बहस को जन्म दिया है। आम नागरिकों की अपेक्षा है कि धार्मिक आयोजन आस्था,संस्कृति और सामाजिक एकता के प्रतीक बनें तथा प्रशासन भी किसी समिति या व्यक्ति विशेष को देखकर नहीं,बल्कि निर्धारित नियमों के आधार पर समान रूप से व्यवस्था सुनिश्चित करे।



