मुंगेली/भाई-बहन के आपसी प्रेम और विश्वास का पर्व रक्षाबंधन है। सावन महीने की पूर्णिमा तिथि पर राखी का त्योहार मनाया जाता है। यह दिन भाई-बहनों के प्रेम,रिश्ते,विश्वास और उनकी ताकत को समर्पित है। इस दिन सभी बहनें अपने भाई की तरक्की और सुखी जीवन की कामना करते हुए उसे राखी बांधती हैं। इस दौरान भाई भी बहन के प्रेम-सम्मान को स्वीकार करते हुए उसे जीवन भर रक्षा का वचन देता है। यह दिन रिश्तों सहित घर-परिवार और समाज में भी खुशियों की लहर लेकर आता है। रक्षाबंधन न केवल भारत का मुख्य पर्व है बल्कि कई अन्य देशों में भी इसकी खास रौनक देखने को मिलती हैं।पूरे देश सहित मुंगेली में भी हर्षोल्लास के साथ रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया गया,रक्षाबंधन के त्योहार के मद्देनजर नगर के चौक चौराहों और बाजार भी रंग बिरंगी राखियों से सजी नजर आई वही नगर के होटलों में भी लोग मिष्ठान और फल दुकानों से फल खरीदने के लिए पहुंचने लगे,इस दिन को लेकर बहनों के द्वारा खास तरह की तैयारी की जाती है जिसके बाद शुभ मुहूर्त में बहनों ने भाइयों की कलाइयों में राखी बांधी वही रक्षाबंधन के त्योहार को लेकर कई पौराणिक कथाएं भी है जिनका वर्णन कई पुराणों में मिलता है
रक्षाबंधन से जुड़ी द्रोपदी और श्रीकृष्ण की कथा
रक्षाबंधन से जुड़ी इस कथा के अनुसार एक बार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लग गई थी जिससे लगातार खून बह रह था तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दिया, जिससे उनका खून बहना रुक गया। भगवान कृष्ण ने इस प्रेम और विश्वास के बदले द्रौपदी को उनकी रक्षा का वचन दिया। बाद में जब कौरवों ने द्रौपदी का चीरहरण करने की कोशिश की थी तो श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा की थी। यह कथा रक्षाबंधन के रक्षा सूत्र के महत्व को दर्शाती है।
रक्षाबंधन से जुड़ी इंद्र और इंद्राणी की कथा
भविष्य पुराण के अनुसार जब देवासुर संग्राम में इंद्र असुरों से हार रहे थे,तब उनकी पत्नी इंद्राणी ने एक रक्षा सूत्र तैयार करके इंद्र की कलाई पर बांधा। जिससे इंद्र देव ने युद्ध में विजय प्राप्त की। कहा जाता है कि इस घटना के बाद से ही रक्षासूत्र बांधने की परंपरा की शुरुआत हुई थी। कालांतर में यह त्योहार भाई-बहनों का त्योहार बन गया। आज के समय में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी सुरक्षा की कामना करती हैं।
राखी से जुड़ी राजा बलि और माता लक्ष्मी की कथा
रक्षाबंधन की सबसे भावुक और गहराई से जुड़ी कथाओं में से एक है देवी लक्ष्मी और राजा बलि की यह कहानी,जिसका उल्लेख भागवत पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और अपनी माया से तीनों लोकों को नाप लिया,तब राजा बलि ने अपना सबकुछ दान कर दिया। अपने वचन के पालन के लिए,राजा बलि ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे सदा उसके पास पाताल लोक में निवास करें।भगवान विष्णु राजा बलि के प्रेम और भक्ति से प्रभावित होकर उसके साथ रहने चले गए। लेकिन इस निर्णय से माता लक्ष्मी बहुत व्याकुल हो गईं। अपने प्रिय को वापस लाने के लिए उन्होंने एक सुंदर उपाय सोचा। देवी लक्ष्मी एक सामान्य स्त्री के वेश में राजा बलि के महल पहुंचीं। उन्होंने राजा से शरण मांगी और उसे राखी बांधकर अपना भाई बना लिया। राजा बलि इस बहन के प्रेम और सरल भाव से अभिभूत हो गया। जब लक्ष्मी ने अपनी इच्छा प्रकट की कि वे अपने पति विष्णु को वापस ले जाना चाहती हैं,तो बलि ने बिना एक क्षण रुके,उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया।



