मुंगेली/छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता के शिखर तक पहुँचाने वाले और अपनी आन-बान-शान के लिए पहचाने जाने वाले स्वर्गीय कुमार दिलीप सिंह जूदेव (8 मार्च 1949 – 14 अगस्त 2013) की 14 अगस्त को पुण्यतिथि थी। परंतु अत्यंत खेदजनक स्थिति देखने को मिली,जब लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद का जिला मुख्यालय स्थित भाजपा कार्यालय में महान नेता की उपेक्षा की गई और उनकी पुण्यतिथि तक नहीं मनाई गई।
जिस नेता ने छत्तीसगढ़ में पार्टी के अस्तित्व को गढ़ा और कार्यकर्ताओं में प्राण फूँके,उन्हें ही आज संगठन के स्थानीय नेतृत्व द्वारा दरकिनार कर दिया गया।
जिला कार्यालय पहुंचे केंद्रीय मंत्री और विधायक,फिर भी रही चुप्पी
14 अगस्त के दिन बिलासपुर लोकसभा सांसद व केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू तथा स्थानीय नगर विधायक पुन्नूलाल मोहले नगर प्रवास पर रहे। वे नगर में आयोजित विभिन्न आयोजनों में शामिल हुए और जिला भाजपा कार्यालय भी पहुँचे।
हालांकि,आश्चर्य की बात यह रही कि जिला भाजपा अध्यक्ष या स्थानीय संगठन द्वारा केंद्रीय मंत्री व विधायक को इस महत्वपूर्ण दिन के विषय में अवगत नहीं कराया गया,या फिर नेताओं द्वारा भी इस संवेदनशील विषय को संज्ञान में नहीं लिया गया। परिणामस्वरूप,पार्टी कार्यालय में स्वर्गीय जूदेव जी को श्रद्धांजलि देने जैसा कोई आयोजन संपन्न नहीं हो सका।
‘मूंछों की बाजी’ लगाकर बदल दी थी प्रदेश की राजनीति
स्व. दिलीप सिंह जूदेव की राजनीतिक प्रतिबद्धता का इतिहास स्वर्णिम रहा है।
2003 के ऐतिहासिक चुनाव की हुंकार:
वर्ष 2003 के प्रथम छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान कुमार साहब एकमात्र ऐसे प्रखर नेता थे,जिन्होंने तत्कालीन सत्तारूढ़ दल को खुली चुनौती देते हुए कहा था— “यदि प्रदेश में भाजपा की सरकार नहीं बनी,तो मैं अपनी मूंछें मुड़वा लूँगा।”
उनकी इस ऐतिहासिक चुनौती और स्वाभिमान को जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं ने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम के बदौलत राज्य गठन के बाद हुए पहले ही चुनाव में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। इसके बाद प्रदेश में लगातार तीन बार भाजपा की सरकार रही।
‘घर वापसी’ अभियान से केंद्रीय मंत्री तक का सफर
सांस्कृतिक पुनर्जागरण:1980 के दशक से जूदेव जी ने ‘घर वापसी’ अभियान चलाकर हजारों धर्मांतरित आदिवासियों को पुनः सनातन परंपरा में शामिल कराया। वे स्वयं मंच पर आदिवासियों के पैर धोकर उन्हें मुख्यधारा में लाते थे।
राजनीतिक यात्रा:1975 में जशपुर नगर पालिका अध्यक्ष से शुरुआत कर वे 1989 में जंजगीर-चांपा से सांसद बने। 1992 से 2004 तक लगातार तीन बार राज्यसभा सांसद रहे और 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री का दायित्व संभाला। वर्ष 2009 में वे बिलासपुर से भारी मतों से जीतकर पुनः लोकसभा पहुँचे।
कार्यकर्ताओं में रोष:क्या पार्टी अपने आधार स्तंभों को भूल रही है?
14 अगस्त 2013 को मेदांता अस्पताल में अंतिम सांस लेने वाले इस युगपुरुष को उनकी पुण्यतिथि पर भुला दिए जाने से निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस नेता की बदौलत आज पार्टी इस मुकाम पर खड़ी है,उनकी ऐसी उपेक्षा संगठन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
जूदेव जी सदैव हमारे आदर्श लेकिन आयोजन के नाम पर चुप्पी
वही इस विषय पर भाजपा जिला अध्यक्ष दीनानाथ केशरवानी का अपना अलग ही तर्क है उनका कहना है कि जूदेव जी उनके और पार्टी के सदैव आदर्श रहे हैं लेकिन जब उनसे जब पूछा गया कि क्यों केंद्रीय राज्य मंत्री और नगर विधायक के जिला मुख्यालय के भाजपा कार्यालय में मौजूदगी के बावजूद उनके पुण्यतिथि पर दो मिनट का श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया तो उनके द्वारा गोलमोल जवाब दिया गया
जमीनीस्तर के कार्यकर्ताओं में असंतोष:क्या अटल-आडवाणी की सोच वाली भाजपा विलुप्त हो गई
वही इस घटनाक्रम को लेकर जमीनीस्तर के कार्यकर्ताओं में भारी रोष व्याप्त है उनका सीधा कहना है कि जिन नेताओं को आदर्श मानकर वें पार्टी के कार्यों को पूरी निष्ठा से करते थे क्या उन नेताओं का अस्तिव अब समाप्त हो चुका है,क्या भाजपा जो अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं के राष्ट्र निर्माण की सोच को आत्मसात करके पार्टी के विचारधारा के साथ चलते थे वो अब क्यों कहीं नजर नहीं आती,जो पार्टी देश में मात्र 2 सांसदों से अपनी शुरुआत की और मौजूदा समय में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुई क्या आज की भाजपा वो ही भाजपा है जिनके साथ जुड़कर कार्य करना कार्यकर्ता अपनी शान समझते थे,ये ऐसे सवाल है जो आज देश और प्रदेश का हर जमीनी कार्यकर्ता पूछ रहा है लेकिन इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है…ऐसे में प्रदेश की सत्ता में काबिज भाजपा को सोचना चाहिए कि अपने नेता और कार्यकर्ता की उपेक्षा कहीं आने वाले समय में पतन का कारण ना बन जाए..क्योंकि लोग दूसरे (विपक्ष)से किए व्यवहार और उपेक्षा को तो सहन कर सकते हैं लेकिन अपने ही घर (पार्टी)के सदस्यों द्वारा किया गया उपेक्षा एक गहरे घाव की तरह होता है जो कभी नहीं भरता



