मुंगेली/प्रदेश ब्यूरो/छत्तीसगढ़ में इन दिनों मानसून की आहट के साथ ही किसान अपनी फसलों की बुआई की तैयारियों में जुट गए हैं। एक तरफ जहां किसान खाद और बीज की किल्लत से पहले ही दो-चार हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके सामने एक और नई और बेहद गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। यह समस्या है खेतों में बिखरा कांच और प्लास्टिक का कचरा। प्रदेश की सरकारी शराब दुकानों के आसपास स्थित उपजाऊ खेत इन दिनों शराब की खाली बोतलों, पानी के पाउच और डिस्पोजल गिलासों के डंपिंग ग्राउंड बन चुके हैं,जिससे किसानों की उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे बंजर होने की कगार पर पहुंच रही है।
सरकारी दुकानों की संख्या बढ़ी,खेतों में बढ़ा कचरा
सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश सरकार द्वारा संचालित शराब दुकानों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। पहले से संचालित 674 दुकानों के बाद,67 नई दुकानों के प्रस्ताव को मिलाकर अब पूरे प्रदेश में करीब 741 शराब दुकानें संचालित की जा रही हैं। इनमें से अधिकांश दुकानें ग्रामीण क्षेत्रों या गांवों की सीमाओं के आसपास खुली हैं।
इसका सीधा असर यह हो रहा है कि मदिराप्रेमी इन दुकानों से शराब और आसपास से चखना खरीदते हैं और एकांत व सुकून की तलाश में पास के खेतों का रुख कर लेते हैं। शराब पीने के बाद वे कांच की खाली बोतलें,पानी के प्लास्टिक पाउच और डिस्पोजल ग्लास वहीं खेतों में ही छोड़ देते हैं। नतीजा यह है कि हरे-भरे खेत अब कचरे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं।
विरोध करने पर विवाद:खौफ के साए में किसान
इस समस्या का सबसे दुखद पहलू यह है कि यदि कोई किसान अपनी ही जमीन पर कचरा फैलाने या शराब पीने से मना करता है,तो ये तत्व गाली-गलौज और मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। असामाजिक तत्वों के डर और विवाद से बचने के लिए सीधे-साधे किसान भयभीत हैं। अपनी ही आंखों के सामने अपनी मां जैसी उपजाऊ जमीन की दुर्गति होते देखना उनकी मजबूरी बन गई है। यह आलम अब केवल मुंगेली का नहीं,बल्कि प्रदेश के सैकड़ों गांवों का हो चुका है।
मानसून सिर पर,किसानों पर पड़ रही ‘दोहरी मार’
कुछ ही दिनों में मानसून का आगमन होने वाला है। खेतों की जुताई और बुआई का काम शुरू होना है। ऐसे में जिन किसानों की जमीनें शराब दुकानों के आसपास हैं, उनके सामने संकट खड़ा हो गया है। अगर वे इन खेतों में ट्रैक्टर या बैल चलाते हैं, तो कांच के टुकड़ों से मवेशियों के पैर कटने और ट्रैक्टर के टायर फटने का भारी खतरा है।
इस कचरे को साफ कराने के लिए किसानों को अपनी जेब से अतिरिक्त पैसे खर्च कर मजदूर लगाने पड़ रहे हैं। किसानों का कहना है कि
एक तरफ हमें खाद-बीज के लिए परेशान होना पड़ रहा है,वहीं दूसरी तरफ दूसरों की अय्याशी की गंदगी साफ करने के लिए हमें अकारण आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। यह हमारे ऊपर दोहरी मार है।
राजस्व के चक्कर में मूकदर्शक बना आबकारी विभाग
पीड़ित किसानों का सीधा आरोप है कि सरकार शराब बेचकर करोड़ों रुपये का राजस्व (मोटी रकम) वसूल रही है,लेकिन इसके दुष्परिणामों से किसानों को लावारिस छोड़ दिया गया है। सरकार ने प्रदेश में करीब 335 अहातों (बैठकर पीने के वैध स्थान) का आवंटन किया है। इसके बावजूद मदिराप्रेमी अहातों में जाने के बजाय खेतों को अपनी ‘मधुशाला’ बना रहे हैं।
किसानों का सवाल है कि आबकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी आखिर मूकदर्शक बनकर यह सब क्यों देख रहे हैं? खेतों को कचराघर बनाने वाले इन लोगों पर कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?
जिला प्रशासन को निर्देश दिए जाने की मांग
अब प्रदेशभर के किसानों ने मांग की है कि राज्य सरकार इस गंभीर समस्या को संज्ञान में ले। जिला प्रशासनों और पुलिस महकमे को निर्देश जारी किए जाएं ताकि खेतों में अवैध रूप से शराब पीने और कचरा फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।
अब देखना होगा कि सुशासन की सरकार अन्नदाताओं को इस अकारण मिल रहे दर्द से निजात दिलाने के लिए क्या कारगर कदम उठाती है,ताकि मानसून से पहले किसानों के चेहरे पर मुस्कान लौट सके।



