सचीपुरम और सोनकर सेल्स कॉलोनी के रहवासियों का फूटा गुस्सा,ज्ञापनों के ढेर के बाद भी नहीं जागा प्रशासन…अब जनता पूछ रही ‘वोट और टैक्स के समय कालोनी वैध,सुविधाओं के समय अवैध क्यों
मुंगेली/नगर पालिका परिषद मुंगेली के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर यदि देखना हो तो नवागढ़ रोड स्थित सचीपुरम कॉलोनी और बिलासपुर रोड स्थित सोनकर सेल्स कॉलोनी पहुंच जाइए। यहां वर्षों से हजारों लोग अपने परिवार के साथ निवास कर रहे हैं,लेकिन आज भी वे सड़क,नाली,जल निकासी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि आखिर इन नागरिकों का कसूर क्या है? क्या अपना घर बनाने का सपना देखना ही इनकी सबसे बड़ी गलती थी?
इन दोनों कॉलोनियों को विकसित करते समय संबंधित कालोनाइजरों ने लोगों को सर्वसुविधायुक्त कॉलोनी का सपना दिखाया था। चौड़ी सड़कें,पक्की नालियां,बेहतर जल निकासी,व्यवस्थित विकास और आधुनिक सुविधाओं का ऐसा खाका प्रस्तुत किया गया कि लोगों ने जीवनभर की जमा-पूंजी लगाकर प्लॉट खरीदे और अपने सपनों का आशियाना बना लिया। लेकिन प्लॉट बिकते ही सारे वादे हवा हो गए। सुविधाएं तो दूर,आज तक बुनियादी व्यवस्था भी नहीं मिल सकी।वही मानसून के मौसम में तो स्थिति और भयावह हो जाती है सड़को पर कीचड़ और बजबजाती नलियों से उठने वाली दुर्गंध से कालोनी वासियों का जीना दूभर हो जाता है इतना ही नहीं कच्ची सड़को की वजह से मुख्यमार्ग तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है और बारिश के दिनों में रहवासी अपने ही घर में कैद होने पर मजबूर हो जाते हैं बावजूद इसके आज तक इनकी इन समस्याओं को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया और ना ही किसी के द्वारा कालोनी वासियों को मूलभूत सुविधाए देने की पहल की मांग करने पर अधिकारी निराश करते हैं वही जनप्रतिनिधियों को समस्याओं से अवगत कराया जाता है तो उनके द्वारा सिर्फ समस्याएं जल्द दूर होंगी कह के आश्वासन का झुनझुना थमा दिया जाएगा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन कालोनाइजरों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई जिन्होंने सुविधाओं का वादा कर लोगों से करोड़ों रुपये लेकर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया? क्या नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित है? यदि कॉलोनी विकसित करने के नाम पर लोगों को गुमराह किया गया तो संबंधित कालोनाइजरों के खिलाफ अब तक एफआईआर,जुर्माना या अन्य कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
वर्षों से कॉलोनीवासी अपनी समस्याओं को लेकर नगर पालिका परिषद,जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटा रहे हैं। कई बार ज्ञापन सौंपे गए,अधिकारियों से मुलाकात की गई,जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई और मांग की गई कि कॉलोनियों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तथा जिम्मेदार कालोनाइजरों पर कठोर कार्रवाई की जाए। लेकिन इन ज्ञापनों का परिणाम आज तक शून्य ही रहा। फाइलें आगे बढ़ीं या दबा दी गईं इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
जब भी रहवासी नगर पालिका से सड़क,नाली या अन्य सुविधाओं की मांग करते हैं तो उन्हें एक रटा-रटाया जवाब मिलता है—”यह अवैध कॉलोनी है,इसलिए नगर पालिका कुछ नहीं कर सकती।” लेकिन यही तर्क कई सवालों को जन्म देता है।

यदि कॉलोनियां वास्तव में अवैध हैं तो फिर इन्हीं कॉलोनियों में नगर पालिका ने भवन अनुज्ञा कैसे जारी की? विद्युत विभाग ने बिजली कनेक्शन और मीटर किस आधार पर लगाए? लोग वर्षों से संपत्ति कर किसे दे रहे हैं? क्यों जनप्रतिनिधि वोट लेने और प्रशासन टैक्स लेने के समय सक्रिय होते हैं लेकिन जैसे ही मूलभूत सुविधा और समस्याओं को दूर करने की बात आती है ये धृतराष्ट्र की भूमिका में आ जाते हैं
इतना ही नहीं हाल ही में डीडीएन योजना के तहत नगर पालिका ने इन घरों पर क्यूआर कोड युक्त बोर्ड लगाए हैं। इन्हें स्कैन करने पर मकान मालिक का नाम,मकान का क्षेत्रफल,कर संबंधी जानकारी सहित कई विवरण सामने आ जाते हैं। जब सरकारी रिकॉर्ड में हर घर की पूरी जानकारी मौजूद है,टैक्स वसूला जा रहा है,सरकारी योजनाओं में इनका डेटा शामिल है,तब केवल मूलभूत सुविधाओं की बात आते ही ये कॉलोनियां “अवैध” कैसे हो जाती हैं?
यही वह सवाल है जो अब हर नागरिक पूछ रहा है क्या कानून केवल सुविधाएं देने के समय याद आता है और टैक्स लेने के समय भूल जाता है?
राजनीतिक दलों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। हर चुनाव में नेता इन कॉलोनियों में पहुंचते हैं,विकास के वादे करते हैं,वोट मांगते हैं और चुनाव खत्म होते ही सब कुछ भूल जाते हैं। तब न सड़क दिखाई देती है न नाली और न ही नागरिकों की पीड़ा। आखिर चुनाव के समय ये कॉलोनियां वैध कैसे हो जाती हैं और चुनाव समाप्त होते ही अवैध घोषित कर दी जाती हैं?
अब लोगों का आक्रोश खुलकर सामने आने लगा है। रहवासी पूछ रहे हैं
क्या कालोनाइजर इतने प्रभावशाली हैं कि प्रशासन उनके खिलाफ कार्रवाई करने से डरता है? क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों पर किसी प्रकार का दबाव है? क्या लोगों से किए गए वादों की कोई जवाबदेही नहीं है? यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
यह भी एक गंभीर तथ्य है कि वर्षों से ज्ञापन दिए जाने के बावजूद न तो सुविधाएं मिलीं और न ही किसी जिम्मेदार पर प्रभावी कार्रवाई हुई। इससे आम नागरिकों के मन में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है। यदि प्रशासन और नगर पालिका समय रहते ठोस कदम नहीं उठाते तो यह आक्रोश आने वाले समय में बड़े जनआंदोलन का रूप भी ले सकता है।
आज सचीपुरम और सोनकर सेल्स कॉलोनी के लोग किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे। वे केवल वही अधिकार मांग रहे हैं जो हर नागरिक का संवैधानिक और मानवीय अधिकार है पक्की सड़क,नाली,जल निकासी और सम्मानपूर्वक जीवन।
अब निगाहें नगर पालिका परिषद,जिला प्रशासन,संबंधित विभागों,जनप्रतिनिधियों और प्रदेश सरकार पर टिकी हैं। सवाल साफ है—क्या जिम्मेदार लोग जनता के इन सवालों का जवाब देंगे? क्या वर्षों से लंबित मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी? और सबसे महत्वपूर्ण,क्या लोगों को सपने बेचकर छोड़ देने वाले जिम्मेदार कालोनाइजरों पर आखिरकार कोई कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



